🇲🇰3 Friends (तीन दोस्त)-Inspiring Stories | Motivational Stories | Easy Guidelines | Facts of Life🇲🇰


तीन मित्र चले जा रहे थे सुनसान सड़क पर अपने गंतव्य की ओर। चुपचाप अपनी धुन में,  अपने विचारों में लीन।

चलते-चलते बहुत समय हो गया। मंज़िल अभी दूर थी। तीनों मित्रों ने एक-एक बैग हाथ में उठा रखा था और एक-एक बैग पिट्ठू की तरह कमर पर लाद रखा था।

 कुछ समय बाद  उनमें से एक मित्र ने चुप्पी तोड़ी।

"मित्रों!  मुझे चलने से थकान महसूस हो रही है। अब मैं आगे नहीं चल सकता। कहीं वृक्ष की छाया में बैठकर थकावट उतारने की कोशिश करनी चाहिए ताकि आगे चलने की ताकत मिल सके।"

दोनों मित्रों ने उसकी ओर देखा तो लगा कि वह वास्तव में बहुत थक गया है।

थोड़ी दूर पर एक पेड़ दिखाई दिया,  जिसके नीचे चबूतरे पर एक पानी से भरा हुआ घड़ा रखा हुआ था। उन्होंने सोचा कि इस दुनिया में परोपकार करने वालों की कमी नहीं है।

किसी ने हमारे जैसे थके-मांदे राहगीरों के लिए ही यह प्रबंध किया हुआ है।

तीनों उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गए।

पहला मित्र बहुत थका हुआ था और दूसरे मित्र के चेहरे पर भी थकान के लक्षण दिखाई देने लगे थे। पर यह क्या ? तीसरा मित्र प्रसन्न मुख मुद्रा में था।

दोनों मित्रों के मन में इस प्रसन्नता का रहस्य जानने की इच्छा हुई।

" मित्र! तुम्हारे पास भी हमारी तरह दो बैग हैं। ऐसा इनमें क्या है जो तुम इतना बोझ उठा कर चलने के बाद भी थकान महसूस नहीं कर रहे।"

उसने उत्तर दिया कि यह तो मैं बाद में बताऊंगा कि इनमें क्या है? पहले तुम बताओ कि तुम अपने बैग में क्या लेकर चल रहे हो?"

पहले मित्र ने कहा - "अरे भाई!  कुछ खास नहीं है। आगे वाला बैग दूसरों द्वारा की गई  बुराइयों से भरा हुआ है और पिट्ठू बैग में उनकी अच्छाइयाँ हैं।

मेरी दृष्टि आगे वाले बैग पर रहती है और उन बुराइयों के बारे में सोच-सोच कर मेरे दिल-दिमाग पर बोझ बढ़ता जा रहा है। मेरी थकावट का यही कारण है।"

तभी दूसरा मित्र बोला - "मित्र! मेरे पास भी इन्हीं दोनों वस्तुओं के बैग हैं। फर्क इतना ही है कि मैंने बुराइयों वाला बैग पीछे पीठ पर टांग रखा है और अच्छाइयों वाला बैग हाथ में पकड़ा हुआ है।

मैं उनकी अच्छाइयों का ध्यान करते हुए चल रहा हूं,  इसलिए मुझे अपेक्षाकृत कम थकान महसूस हो रही है।

पर यह तो बताओ कि तुम प्रसन्नचित कैसे बने हुए हो?"

तीसरे मित्र ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया - " मित्रों! तुम्हें यह जान कर आश्चर्य होगा कि मेरे बैग में भी यही दोनों वस्तुएं हैं।

मैंने पहले मित्र की तरह बुराइयों का बैग आगे नहीं रखा हुआ बल्कि दूसरे मित्र की तरह पीठ पर टांग रखा है ताकि मुझे किसी की बुराई दिखे ही नहीं।

इसके अलावा मैंने पिछले बैग में एक छेद किया हुआ है ताकि मेरे दिमाग से उनकी बुराइयों का बोझ एक-एक करके कम होता रहे और मैं स्वयं को हल्का महसूस कर सकूं।

यहां तक आते- आते मेरा पिछला बैग खाली हो चुका है क्योंकि उनको रखने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।"

बंधुओं!  क्या हम तीसरे मित्र के समान नहीं बन सकते?

Om Shanti

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