Inspirational Stories - अहंकार की कोई कीमत नहीं (No Cost To Ego)

Inspirational Stories - अहंकार की कोई कीमत नहीं 

एक राज्य में एक बार एक महात्माजी आ गये। सम्राट किशनचंद उनसे मिलने गये, उनके साथ उनके सेनापती और कुछ सैनिक भी थे, महाराज ने महात्मा के चरणों में सिर रख दिया। इतने बड़े राज्य के सम्राट सभी के सामने एक भिक्षा मांगने वाले एक भिखारी के पैरों पे सिर रखे ये सेनापती को अच्छा नहीं लगा, महल लौटते ही उसने कहा कि नहीं सम्राट, यह मुझे ठीक नहीं लगा। आप जैसा सम्राट, जिसकी किर्ति शायद जगत में कोई सम्राट नहीं छू सकेगा फिर, वह एक साधारण से भिखारी के चरणों पर सिर रखे.? 

     सम्राट हंस कर चुप रह गये। कुछ महीने बीत जाने के बाद सम्राट ने सेनापती को बुलाया और कहा कि एक काम करना है। कुछ प्रयोग करना है, तुम यह सामान ले जाओ और गांव में बेच आओ। सामान बड़ा अजीब था। उसमें बकरी का सिर था, गाय का सिर था, आदमी का सिर था, कई जानवरों के सिर थे और कहा कि जाओ बेच आओ बाजार में।

       महाराज के आदेश पर सेनापती वह सब लेकर बेचने बाजार  गये। गाय का सिर भी बिक गया और घोड़े का सिर भी बिक गया, सब बिक गया, लेकिन आदमी का सिर नहीं बिका। कोई लेने को तैयार नहीं था कि इस गंदगी को कौन लेकर क्या करेगा.? इस खोपड़ी को कौन रखेगा.? वह वापस लौट आया और कहने लगा कि महाराज.! बड़े आश्चर्य की बात है, सब सिर बिक गए , सिर्फ आदमी का सिर नहीं बिक सका ।  कोई नहीं लेता है ।

     सम्राट ने कहा, कि मुफ्त में दे आओ। वह सेनापती वापस जा कर, कई लोगों के पास गया कि मुफ्त में देते हैं इसे, इसे आप रख लें। लेकिन सभी ने कहा पागल हो गए हो ! और फिंकवाने की मेहनत कौन करेगा.? आप इसे वापस ले जाइए। सेनापती वापस लौट आया और सम्राट से कहने लगा कि महाराज, इसे कोई मुफ्त में भी नहीं लेता।

      तब सम्राट ने कहा, कि अब मैं तुमसे यह पूछता हूं कि अगर मैं मर जाऊं और तुम मेरे सिर को बाजार में बेचने जाओ तो कोई फर्क पड़ेगा.? सेनापती थोड़ा डरा और उसने कहा कि मैं कैसे कहूं क्षमा करें तो कहूं। महाराज, आपके सिर को भी कोई नहीं ले सकेगा। मुझे पहली दफा पता चला कि आदमी के सिर की कोई भी कीमत नहीं है।

     यह सुन कर सम्राट किशनचंद ने अपने सेनापती से कहा कि फिर इस बिना कीमत के सिर को अगर मैंने एक भिक्षुक के पैरों में रख दिया था तो तुम क्यों इतने परेशान हो गए थे ।

     आदमी के सिर की कीमत नहीं, अर्थात आदमी के अहंकार की कोई भी कीमत नहीं है। आदमी का सिर तो एक प्रतीक है आदमी के अहंकार का, ईगो का। और अहंकार की सारी चेष्टा है भीतर लाने की और भीतर कुछ भी नहीं जाता—न धन जाता है, न मान जाता है, न पद और प्रतिष्ठा जाती है। कुछ भी साथ नहीं जाता। साथ जाते हैं मनुष्यों के अपने कर्मों का फल फिर चाहे वो अच्छे हो या बुरे कर्म, इसलिए, हमें अपने कर्मों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, और शुभ कर्म ही करने चाहिए.! क्योंकि हमारे कर्मों के फल के कारण ही हमें जीवन में सुख या दुख मिलता है, कर्मों का फल ही जनम-जनम हमारे साथ चलते हैं.! 

कहते हैं कि - जो बोया,वही पायेंगे.
जैसा कर्म करे, वैसा फल पाये इन्सान.! 

Inspirational Stories - अहंकार की कोई कीमत नहीं (No cost to ego)


Inspirational Stories - No cost to ego

Once in a state, a Mahatma came. Emperor Kishanchand went to meet him, he was accompanied by his general and some soldiers, Maharaja laid his head at the feet of the Mahatma. The emperor of such a big state, in front of everyone, put his head on the feet of a beggar who asked for a beggar, this general did not like it, on returning to the palace he said, "No emperor, it did not suit me." An emperor like you, whose fame perhaps no emperor in the world will be able to touch, then he should lay his head on the feet of a simple beggar.

     The emperor laughed and kept quiet. After a few months had passed, the emperor called the general and told him that one thing had to be done. You have to use something, you take this stuff and sell it in the village. The stuff was very strange. It had a goat's head, a cow's head, a man's head, several animals' heads, and said, "Go sell, come to the market".

       On Maharaja's orders, the generals took all that and went to the market to sell. The head of the cow was also sold and the head of the horse was also sold, everything was sold, but the man's head did not sell. No one was willing to take who would do with this mess. Who will keep this skull? He returned and started saying that Maharaj. Surprisingly, all heads were sold, only the man's head could not be sold. No one takes

     The emperor said, give it for free. He went back to the general, went to many people to give it for free, you keep it. But everyone said you have gone mad! And who will work hard to throw it? You take it back The commander returned and started telling the emperor that Maharaj, nobody even takes it for free.
      Then the Emperor said, now I ask you that if I die and you go to sell my head in the market then it will make a difference. The commander was a little scared and said that how can I say sorry then say it. Maharaj, no one will be able to take your head. For the first time I came to know that there is no cost to a man's head.

     Hearing this, Emperor Kishanchand told his general that if I had put this headless price in the feet of a monk, then why you were so upset.

     Man's head is not worth, that is, man's ego has no value. Man's head is a symbol of man's ego, Ego's. And the ego has all the efforts to bring it in and nothing goes inside - neither money goes, nor it is accepted, nor position and prestige goes. Nothing goes together. People go along with the fruits of their deeds whether they are good or bad deeds, therefore, we should pay special attention to our deeds, and do good deeds. Because we get happiness or sorrow in life only because of the fruits of our actions, the fruits of our actions go with us Janam Janam Janam.

It is said that what you sow, you will receive only
Receive the fruit as you do.

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