Inspiring Stories- माया की गठरी | Life Changing Stories - Easy Guidelines By BK Shradha Agrawal


किसी गांव में एक संत घूमा करते थे। उनकी सफेद लंबी दाढ़ी थी और हाथ में एक मोटा डंडा।

चीथड़ों में लिपटा उसका ढीला—ढीला और झुर्रियों से भरा बुढ़ापे का शरीर। अपने साथ एक गठरी लिए रहते थे सदा। और गठरी पर बड़े—बड़े अक्षरों में लिख रखा था -

'माया'। वह बार—बार उस गठरी को खोलते भी थे। उसमें उन्होंने बड़े जतन से रंगीन रही कागज लपेट कर रख छोड़े थे।

कहीं मिल जाते रास्ते पर तो कागजों को इकट्ठा कर लेते। अपनी माया की गठरी में रख लेता। जिस गली से निकलते उसमें रंगीन कागज दिखते तो बड़ी सावधानी से उठा लेते। 

सिकुड़नों पर हाथ फेरते, उनकी गड्डी बनाकर, जैसे कोई नोटों की गड्डी बनाता है, अपनी माया की गठरी में रख लेते। उनकी गठरी रोज बड़ी होती जाती थी।

लोग उन्हें समझाते कि पागल, यह कचरा क्यों ढोता है ? 
वह हंसते और कहते कि  खुद पागल हैं वे दूसरों को पागल बता रहे हैं।

कभी—कभी किसी दरवाजे पर बैठ जाते और कागजों को दिखा कर कहते, ये मेरे प्राण हैं। ये खो जाएं तो मैं एक क्षण जी न सकूंगा।

ये खो जाएं तो मेरा दिवाला निकल जाएगा। ये चोरी चले जाएं तो मैं आत्म-हत्या कर लूंगा। कभी कहते ये मेरे रुपये हैं, यह मेरा धन है।

इनसे मैं अपने गांव के गिरते हुए किले का पुन: निर्माण कराऊंगा। कभी अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेर कर स्वाभिमान से कहते उस किले पर हमारा झंडा फहराएगा और मैं राजा बनूंगा और कभी कहते किं इनको नोट ही मत समझो, इनकी ही मैं नावें बनाऊंगा। इन्हीं नावों में बैठ कर उस पार जाऊंगा और लोग हंसते और बच्चे हंसते औरते भी हंसती। और जब भी कोई जोर से हंसता तो वह कहते, चुप रहो। पागल हो और दूसरों को पागल समझते हो।

तभी गांव में एक ज्ञानी का आगमन हुआ। और उस ज्ञानी ने गाव के लोगों से कहा, इनको पागल मत समझो और इनकी हंसी मत उड़ाओ। इनकी पूजा करो नासमझो! क्योंकि यह जो गठरी ढो रहे है,

तुम्हारे लिए ढो रहे है। ऐसे ही कागज की गठरियां तुम ढो रहे हो। यह तुम्हारी मूढ़ता को प्रकट—करने के लिए इतना श्रम उठा रहे है। इनकी गठरी पर इन्होने 'माया' लिख रख छोड़ा है। कागज, कूड़ा—कचरा भरा है।

 तुम क्या लिए घूम रहे हो..??
 तुम भी सोचते हो कि महल बनाएंगे, उस पर झंडा फहराएंगे।नाव बनाएंगे, उस पार जाएंगे। सिकंदर बनेंगे कि नेपोलियन। 

सारे ससार को जीत लेंगे। बड़े किले बनाएंगे कि मौत भी प्रवेश न कर सकेगी और जब यह ज्ञानी समझाने लगे लोगों को तो वहाँ खड़े वो संत हंसने लगे और उन्होने कहा कि मत समझाओ।

ये खाक समझेंगे। ये कुछ भी न समझेंगे। मैं वर्षों से समझाने की कोशिश कर रहा हूं। ये सुनते नहीं। ये मेरी गठरी देखते हैं, अपनी गठरी नहीं देखते। ये मेरे रंगीन कागजों को रंगीन कागज समझते हैं और जिन नोटों को इन्होंने तिजोडियो में भर रखा है, उन्हें असली धन समझते हैं। मुझे कहते हैं पागल, खुद पागल हैं।

यह पृथ्वी बड़ा पागलखाना है। इसमें से जागो। इसमें से जागो, इसमें से न जागे तो बार—बार मौत आएगी और बार—बार तुम वापस इसी पागलखाने में फेंक दिए जाओगे। 

फिर—फिर जन्म! इसीलिए तो पूरब के मनीषी एक ही चिन्तन करते रहे हैं सदियों से— आवागमन से कैसे छुटकारा हो ? 

कैसे मिटे जन्म ? कैसे मिटे मौत ?

 मिटने का एक ही उपाय है। तुम्हारे भीतर कुछ ऐसा है जिसका न कभी जन्म हुआ और न कभी मृत्यु होती है। 

तुम्हारे भीतर अजन्मा और अमृतस्वरूप कुछ पड़ा है और वही तुम्हारा हीरा है, उसे खोज लो। वही तुम्हारा धन हैं..!!

Om Shanti

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